4. SYNCHRONOUS MOTOR notes in hindi

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4. SYNCHRONOUS MOTOR (सिंक्रोनस मोटर)

सिंक्रोनस मोटर एक प्रकार की एसी मोटर है, जो एक निश्चित गति (जिसे सिंक्रोनस स्पीड कहते हैं) पर काम करती है, जो लोड के आधार पर नहीं बदलती। यह मोटर आमतौर पर उन अनुप्रयोगों में उपयोग की जाती है, जहां गति का सटीक नियंत्रण आवश्यक होता है, जैसे घड़ियाँ, बड़े मशीनों में और औद्योगिक ड्राइव्स में।

4.1 कार्य/ऑपरेशन का सिद्धांत:

सिंक्रोनस मोटर का कार्य सिद्धांत चुंबकीय प्रेरण (electromagnetic induction) पर आधारित है।

  • स्टेटर: मोटर का स्टेटर तीन-फेज एसी सप्लाई द्वारा प्रेरित किया जाता है, जो एक घूमते हुए चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण करता है। यह घूमता हुआ चुंबकीय क्षेत्र एक निश्चित गति (सिंक्रोनस स्पीड) पर घूमता है।

  • रोटर: सिंक्रोनस मोटर का रोटर भी एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है, जो स्टेटर के घूमते हुए चुंबकीय क्षेत्र के साथ लॉक हो जाता है और रोटर भी उसी गति पर घूमने लगता है (सिंक्रोनस स्पीड)। रोटर को डीसी (DC) द्वारा उत्तेजित किया जाता है ताकि यह चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न कर सके।

  • सिंक्रोनस स्पीड: सिंक्रोनस मोटर एक स्थिर गति पर चलती है जिसे सिंक्रोनस स्पीड कहा जाता है। यह स्पीड एसी सप्लाई की फ्रीक्वेंसी और स्टेटर में पाए जाने वाले पोल की संख्या पर निर्भर करती है, और इसका सूत्र है:

    Ns=120fPN_s = \frac{120f}{P}

    जहाँ:

    • NsN_s = सिंक्रोनस स्पीड (RPM में)
    • ff = सप्लाई की फ्रीक्वेंसी (Hz में)
    • PP = पोल की संख्या

इस गति पर, रोटर स्टेटर के घूमते हुए चुंबकीय क्षेत्र के साथ पूरी तरह से सिंक्रोनस हो जाता है और मोटर बिना किसी स्लिप के कार्य करती है।

4.2 लोड कोण (Load Angle) का महत्व:

लोड कोण (या पावर कोण) वह कोण है जो रोटर के चुंबकीय क्षेत्र और स्टेटर के चुंबकीय क्षेत्र के बीच होता है। यह कोण मोटर के टॉर्क और पावर को प्रभावित करता है।

  • लोड और लोड कोण: जैसे-जैसे लोड बढ़ता है, लोड कोण बढ़ता है। मोटर लोड को पूरा करने के लिए टॉर्क उत्पन्न करती है और यह लोड कोण बढ़ जाता है।

  • पावर ट्रांसफर: मोटर द्वारा प्रदान की जाने वाली शक्ति लोड कोण पर निर्भर करती है। यदि लोड कोण अत्यधिक बढ़ जाता है, तो मोटर सिंक्रोनसिटी खो सकती है और स्लिप शुरू हो सकती है।

  • स्थिरता: अगर लोड कोण बहुत बड़ा हो जाता है, तो यह मोटर के सिंक्रोनस रहने की संभावना को कम करता है। इसलिए, लोड कोण का मान नियंत्रित रखना आवश्यक होता है।

4.3 टॉर्क: स्टार्टिंग टॉर्क, रनिंग टॉर्क, पुल-इन टॉर्क, पुल-आउट टॉर्क:

सिंक्रोनस मोटरों में टॉर्क के कुछ विशिष्ट गुण होते हैं:

  1. स्टार्टिंग टॉर्क: सिंक्रोनस मोटर में स्टार्टिंग टॉर्क उतना अधिक नहीं होता जितना कि इंडक्शन मोटर में होता है। इसे शुरू करने के लिए बाहरी उपकरणों या सहायक मोटर की आवश्यकता होती है। जैसे ही रोटर सिंक्रोनस स्पीड तक पहुँचता है, मोटर चलने लगती है।

  2. रनिंग टॉर्क: एक बार जब सिंक्रोनस मोटर सिंक्रोनस स्पीड तक पहुँच जाती है, तो यह लोड की आवश्यकता के अनुसार एक स्थिर रनिंग टॉर्क उत्पन्न करती है। यह टॉर्क सामान्यत: लोड के आधार पर बढ़ता या घटता है।

  3. पुल-इन टॉर्क: जब मोटर को शुरू किया जाता है, तो रोटर सिंक्रोनस स्पीड तक पहुँचने के लिए पुल-इन टॉर्क की आवश्यकता होती है। यह वह टॉर्क है जो रोटर को सिंक्रोनस स्पीड तक लाने के लिए चाहिए, जिससे यह स्टेटर के घूमते हुए चुंबकीय क्षेत्र के साथ सिंक्रोनस हो सके।

  4. पुल-आउट टॉर्क: यह वह अधिकतम टॉर्क है जिसे मोटर उत्पादन कर सकती है। यदि लोड पुल-आउट टॉर्क से अधिक हो जाता है, तो मोटर सिंक्रोनसिटी खो सकती है और स्लिप शुरू हो सकती है। यह एक महत्वपूर्ण मान है क्योंकि यह मोटर के अधिकतम लोड को निर्धारित करता है।

4.4 लोड पर सिंक्रोनस मोटर (Constant Excitation के साथ):

जब सिंक्रोनस मोटर पर लोड लगाया जाता है और उत्तेजना (excitation) स्थिर रहती है:

  • मोटर की गति सिंक्रोनस स्पीड पर रहती है।
  • टॉर्क लोड के हिसाब से बढ़ता या घटता है।
  • लोड कोण बढ़ता है, जो यह दर्शाता है कि लोड बढ़ने के साथ-साथ टॉर्क उत्पन्न हो रहा है।
  • अगर उत्तेजना स्थिर रहती है, तो मोटर का संचालन स्थिर रहता है और लोड बढ़ने के बावजूद गति में कोई बदलाव नहीं होता।

4.5 सिंक्रोनस मोटर को शुरू करने के तरीके:

सिंक्रोनस मोटर को सीधे शुरू नहीं किया जा सकता क्योंकि इसे सिंक्रोनस स्पीड तक पहुँचने के लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है। निम्नलिखित तरीके इसका उपयोग करने के लिए होते हैं:

  1. सहायक इंडक्शन मोटर का उपयोग: एक इंडक्शन मोटर को सिंक्रोनस मोटर के साथ जोड़ा जाता है ताकि वह पहले सिंक्रोनस स्पीड तक पहुँच सके। फिर रोटर पर उत्तेजना दी जाती है, और यह सिंक्रोनस हो जाती है।

  2. डैम्पर विंडिंग का उपयोग: डैम्पर विंडिंग रोटर में रखी जाती है ताकि सिंक्रोनस मोटर शुरुआत में एक इंडक्शन मोटर की तरह काम कर सके। यह रोटर को सिंक्रोनस स्पीड तक पहुँचने में मदद करती है।

  3. ऑटो-स्टार्टिंग (VFD का उपयोग): वेरिएबल फ्रीक्वेंसी ड्राइव (VFD) का उपयोग करके मोटर की गति को नियंत्रित किया जाता है। VFD सप्लाई की फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करता है और सिंक्रोनस स्पीड तक लाता है।

  4. स्टार-डेल्टा स्टार्टर: कुछ छोटे मोटरों के लिए स्टार-डेल्टा स्टार्टर का उपयोग किया जाता है, जिसमें मोटर को शुरू में स्टार कनेक्शन में जोड़ा जाता है ताकि वोल्टेज और करंट को कम किया जा सके और बाद में डेल्टा कनेक्शन में स्विच किया जाता है।

4.6 सिंक्रोनस मोटरों में हानि और कार्यक्षमता (Efficiency):

सिंक्रोनस मोटरों में विभिन्न प्रकार की हानियाँ होती हैं जो कार्यक्षमता को प्रभावित करती हैं:

  1. स्टेटर कॉपर हानि: स्टेटर विंडिंग्स में बहने वाली करंट से उत्पन्न होने वाली हानियाँ, जिन्हें कॉपर हानि कहा जाता है। यह हानियाँ करंट के वर्ग के अनुपात में होती हैं।

  2. रोटर कॉपर हानि: यदि रोटर में वाइड रोटर या सालिएंट पोल रोटर हैं, तो रोटर में भी कॉपर हानियाँ उत्पन्न होती हैं।

  3. कोर हानि: स्टेटर और रोटर के चुंबकीय कोर में हाइस्टेरिसिस और एडी करंट्स से उत्पन्न हानियाँ होती हैं।

  4. घर्षण और वाइनडेज हानि: मोटर के बेयरिंग्स और रोटर शाफ्ट पर घर्षण से हानि होती है, और रोटर की हवा में गति करने से वाइनडेज हानि होती है।

  5. उत्तेजना हानि: सिंक्रोनस मोटरों में अलग उत्तेजना प्रणाली होने पर (डीसी उत्तेजना), इसके कारण कुछ हानियाँ उत्पन्न होती हैं।

कार्यक्षमता (Efficiency): सिंक्रोनस मोटर की कार्यक्षमता को उसकी यांत्रिक शक्ति और विद्युत शक्ति के अनुपात द्वारा मापा जाता है। यह मोटर स्थिर लोड पर अधिक कार्यक्षम होती है, लेकिन अगर मोटर सिंक्रोनस स्पीड से बाहर कार्य करती है या उत्तेजना अनुकूलित नहीं है, तो इसकी कार्यक्षमता कम हो सकती है।

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