1. BASICS OF TRANSMISSION AND DISTRIBUTION in Hindi

 

1. TRANSMISSION और DISTRIBUTION के बुनियादी सिद्धांत

1.1 इलेक्ट्रिक सप्लाई ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के घटक के साथ सिंगल लाइन डायराम

सिंगल लाइन डायराम (SLD) एक आवश्यक योजनाबद्ध चित्र है, जिसका उपयोग विद्युत शक्ति प्रणाली को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। यह प्रणाली के जटिल घटकों को सरल तरीके से दिखाता है, जैसे जनरेटर, ट्रांसफॉर्मर, ट्रांसमिशन लाइनें, और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, लेकिन इसमें प्रत्येक चरण के लिए एक ही लाइन का प्रतिनिधित्व किया जाता है, भले ही वास्तविक में कई कंडक्टर हों।

मुख्य घटक:

  1. पावर प्लांट (जनरेटर) – बिजली का स्रोत, जैसे थर्मल, हाइड्रो, या नाभिकीय संयंत्र।
  2. स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर – जनरेशन के बाद, बिजली को उच्च वोल्टेज (110 kV, 220 kV, 400 kV) में बढ़ाया जाता है ताकि लंबी दूरी पर प्रभावी रूप से ट्रांसमिट किया जा सके।
  3. ट्रांसमिशन लाइन – उच्च वोल्टेज की लाइनें (110 kV, 220 kV, 400 kV) लंबी दूरी तक बिजली को ले जाती हैं। ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइनें आमतौर पर उपयोग की जाती हैं।
  4. स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर – जब बिजली सबस्टेशन तक पहुंचती है, तो वोल्टेज को 33 kV, 11 kV जैसी स्तरों तक कम कर दिया जाता है ताकि यह वितरण के लिए उपयुक्त हो।
  5. डिस्ट्रीब्यूशन लाइन – ये कम वोल्टेज की लाइनें (11 kV, 33 kV, 400 V) बिजली को उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं।
  6. कंज्यूमर लोड – अंतिम बिंदु जहां बिजली का उपयोग होता है। इसमें घर, फैक्ट्रियां और व्यवसाय शामिल हैं।

सिंगल लाइन डायराम का उदाहरण:

पावर प्लांट --> स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर --> ट्रांसमिशन लाइन (110 kV/220 kV) --> स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर --> डिस्ट्रीब्यूशन लाइन (33 kV/11 kV) --> कंज्यूमर लोड (घरे/उद्योग)

1.2 ट्रांसमिशन लाइनों का वर्गीकरण

ट्रांसमिशन लाइनों को कई कारकों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जो दूरी, वोल्टेज, और करंट के प्रकार की आवश्यकताओं के आधार पर सही प्रकार की लाइन चुनने में मदद करते हैं।

वोल्टेज स्तर के आधार पर वर्गीकरण:

  • लो वोल्टेज (LV): 1 kV से कम, स्थानीय वितरण के लिए उपयोगी।
  • मीडियम वोल्टेज (MV): 1 kV से 33 kV तक, उप-क्षेत्रीय ट्रांसमिशन के लिए।
  • हाई वोल्टेज (HV): 33 kV से 220 kV तक, अंतर-क्षेत्रीय ट्रांसमिशन के लिए।
  • एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज (EHV): 220 kV से ऊपर, लंबी दूरी के ट्रांसमिशन के लिए उपयोगी।

लंबाई के आधार पर वर्गीकरण:

  • शॉर्ट ट्रांसमिशन लाइन: 50 किमी तक, जहां लाइन प्रतिरोध और रिएक्टेंस छोटा होता है और हानियां महत्वपूर्ण नहीं होतीं।
  • मीडियम ट्रांसमिशन लाइन: 50 किमी से 200 किमी तक, जहां लाइन के प्रेरण और क्षमता को ध्यान में रखना पड़ता है।
  • लॉन्ग ट्रांसमिशन लाइन: 200 किमी से ऊपर, जहां वोल्टेज ड्रॉप और लाइन प्रतिरोध को बारीकी से निगरानी में रखना पड़ता है।

करंट के प्रकार के आधार पर वर्गीकरण:

  • एसी ट्रांसमिशन लाइनें: ये अधिकांश लंबी दूरी के ट्रांसमिशन के लिए उपयोग की जाती हैं।
  • डीसी ट्रांसमिशन लाइनें: बहुत लंबी दूरी के लिए, जहां उच्च-क्षमता ट्रांसमिशन की आवश्यकता होती है (HVDC)। यह 500 किमी से अधिक की दूरी पर अधिक प्रभावी होती हैं।

1.3 प्राथमिक और द्वितीयक ट्रांसमिशन

  • प्राथमिक ट्रांसमिशन: यह बिजली के उत्पादन स्टेशन से सबस्टेशन तक उच्च वोल्टेज पर बिजली के ट्रांसमिशन की प्रक्रिया है। इस चरण में वोल्टेज आमतौर पर 110 kV, 220 kV, और 400 kV के बीच होता है।
    • उदाहरण: एक 400 kV लाइन जो एक थर्मल पावर प्लांट से शहर तक बिजली भेजती है।
  • द्वितीयक ट्रांसमिशन: इसमें वोल्टेज को स्थानीय वितरण के लिए उपयुक्त स्तर पर कम किया जाता है, आमतौर पर 33 kV से 11 kV के बीच। बिजली को स्थानीय क्षेत्रों में ट्रांसमिट किया जाता है।
    • उदाहरण: एक 33 kV लाइन जो एक सबस्टेशन से स्थानीय क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाती है।

मुख्य बिंदु: प्राथमिक ट्रांसमिशन लंबी दूरी के लिए होता है, जबकि द्वितीयक ट्रांसमिशन स्थानीय क्षेत्रों में बिजली वितरण के लिए उपयोग होता है।


1.4 भारत में उपयोग किए जाने वाले मानक वोल्टेज स्तर

भारत में विभिन्न चरणों के लिए विशिष्ट वोल्टेज मानकों का पालन किया जाता है:

  • जनरेशन वोल्टेज: पावर प्लांट्स आमतौर पर 11 kV से 33 kV के बीच बिजली उत्पन्न करते हैं।
  • ट्रांसमिशन वोल्टेज: बिजली को उच्च वोल्टेज (110 kV, 220 kV, 400 kV) में बढ़ाया जाता है ताकि लंबी दूरी तक प्रभावी रूप से ट्रांसमिट किया जा सके।
  • डिस्ट्रीब्यूशन वोल्टेज: फिर बिजली को उपयोगकर्ता के लिए सुरक्षित वोल्टेज स्तर पर कम किया जाता है:
    • 33 kV (बड़े क्षेत्रों के लिए)
    • 11 kV (स्थानीय क्षेत्रों के लिए)
    • 400 V (तीन-फेज सिस्टम के लिए)
    • 220 V (एकल-फेज सिस्टम के लिए)

भारत में वोल्टेज स्तर यह सुनिश्चित करते हैं कि बिजली का कुशलतापूर्वक ट्रांसमिशन और वितरण हो सके।


1.5 पावर ट्रांसमिशन के लिए उच्च वोल्टेज के लक्षण

लंबी दूरी पर पावर ट्रांसमिशन के लिए उच्च वोल्टेज का उपयोग आवश्यक होता है। इसके कारण:

  1. कम करंट: ओम के कानून (V=IRV = IR) के अनुसार, जब वोल्टेज बढ़ाया जाता है, तो वही पावर ट्रांसमिट करने के लिए करंट कम हो जाता है, जिससे ट्रांसमिशन लाइनों में नुकसान कम होता है (क्योंकि पावर लॉस Ploss=I2RP_{\text{loss}} = I^2R पर निर्भर करता है)।

  2. कम ऊर्जा हानियां: उच्च वोल्टेज में ट्रांसमिशन से लाइन लॉस (रजिस्टिव और रिएक्टिव) कम हो जाती हैं, जिससे सिस्टम की दक्षता बढ़ती है।

  3. आर्थिक लाभ: हालांकि उच्च वोल्टेज की संरचना महंगी होती है, लेकिन कम हानियों के कारण लंबी अवधि में यह अधिक आर्थिक होती है।

उदाहरण: 400 kV लाइन का उपयोग लंबी दूरी के ट्रांसमिशन के लिए किया जाता है ताकि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों तक पावर को प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सके।


1.6 इलेक्ट्रिक सप्लाई ट्रांसमिशन सिस्टम का निर्माण विधि

110 kV, 220 kV, और 400 kV ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण के चरण:

  1. रूट का चयन: ट्रांसमिशन लाइन के लिए रास्ते का चयन किया जाता है, जिसमें भौगोलिक बाधाएं, सुरक्षा नियम, और पर्यावरणीय स्थितियां ध्यान में रखी जाती हैं।
  2. फाउंडेशन कार्य: ट्रांसमिशन टावरों के लिए मजबूत नींव बनाई जाती है।
  3. ट्रांसमिशन टावरों का निर्माण: इन टावरों को कंडक्टर को समर्थन देने के लिए डिजाइन किया जाता है। ये टावर हवा, बर्फ और विद्युत लोड को सहन करते हैं।
  4. कंडक्टर स्ट्रिंगिंग: उच्च वोल्टेज वाले कंडक्टर (एल्यूमीनियम) टावरों के बीच खींचे जाते हैं।
  5. सबस्टेशन निर्माण: यहां वोल्टेज को बढ़ाया या घटाया जाता है।
  6. टेस्टिंग और कमीशनिंग: निर्माण के बाद, सिस्टम की परीक्षण किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह ठीक से काम कर रहा है।

उदाहरण: 400 kV ट्रांसमिशन लाइन के निर्माण में गहरे सर्वेक्षण, स्टील टावरों का निर्माण, और उच्च गुणवत्ता वाली इंसुलेशन का उपयोग किया जाता है।


1.7 इलेक्ट्रिक सप्लाई डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का निर्माण विधि

220V, 400V, 11 kV, और 33 kV डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के निर्माण में कदम:

  1. डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का चयन: इस नेटवर्क को पहचानना, जो स्थानीय उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाए।
  2. पोल और टावर का निर्माण: लो-वोल्टेज (400 V, 220 V) के लिए लकड़ी या कंक्रीट पोल्स और हाई-वोल्टेज (11 kV, 33 kV) के लिए स्टील टावर इस्तेमाल होते हैं।
  3. अंडरग्राउंड केबल्स: शहरी क्षेत्रों या विशेष मौसम स्थितियों में अंडरग्राउंड केबल्स का उपयोग किया जाता है।
  4. स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर्स: उच्च वोल्टेज को घटाकर उपभोक्ताओं के लिए उपयुक्त स्तर पर लाया जाता है (जैसे 33 kV को 11 kV में कम करना)।
  5. कंज्यूमर से कनेक्शन: अंत में, बिजली उपभोक्ताओं को दी जाती है।

उदाहरण: एक घर को 220 V या 400 V सप्लाई दी जाती है, जो इसकी प्रकार के अनुसार एकल-फेज या तीन-फेज कनेक्शन हो सकता है।


मुख्य बिंदु:

  • ट्रांसमिशन लाइनें उच्च वोल्टेज वाली होती हैं जो लंबी दूरी तक बिजली ट्रांसमिट करती हैं, जबकि डिस्ट्रीब्यूशन लाइनें कम वोल्टेज वाली होती हैं जो उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाती हैं।
  • उच्च वोल्टेज का उपयोग लंबी दूरी के ट्रांसमिशन के लिए किया जाता है क्योंकि इससे हानियां कम होती हैं और दक्षता बढ़ती है।
  • सिंगल लाइन डायराम (SLD) से विद्युत प्रणाली को सरल और स्पष्ट तरीके से प्रदर्शित किया जाता है।
  • भारत के वोल्टेज स्तर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन को कुशलतापूर्वक सुनिश्चित करते हैं।

अभ्यास प्रश्न:

  1. लंबी दूरी के पावर ट्रांसमिशन के लिए उच्च वोल्टेज क्यों उपयोग किया जाता है?
  2. पावर ट्रांसमिशन प्रणाली में सिंगल लाइन डायराम के प्रमुख घटक क्या हैं?
  3. प्राथमिक और द्वितीयक ट्रांसमिशन में अंतर स्पष्ट करें।
  4. 220 kV ट्रांसमिशन सिस्टम के निर्माण में कौन से मुख्य चरण होते हैं?
  5. पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में स्टेप-अप और स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर की भूमिका क्या है?

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📚 BTER Pathshala

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